🕉️ Bharathiya Sanatana Dharmam - SANATANA DHARM - సనాతన ధర్మం 🕉️
Amaranath Amar
మన దేహములో పది ఇంద్రియములు, ఐదు ప్రాణములు, మనస్సు, బుద్ధి, అహంకారము= 18 భగవద్గీతలో 700 శ్లోకాలు ఉన్నాయి. వాటిలో శ్రీకృష్ణుడు చెప్పినవి 574, అర్జున్నుడు చెప్పినవి 84 సంజయుడు చెప్పినవి 41, ధృతరాష్ట్రుడు చెప్పినది 1 మొత్తం 700. కొన్ని ప్రతులలో 701 ఉన్నాయి.
🙏 Srimad Bhagavadgita Chapter 2 – द्वितीयोऽध्यायः – साङ्ख्ययोगः 🙏
| 01 | सञ्जय उवाच । |
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| 02 | श्रीभगवानुवाच । |
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| 03 | क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते । |
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| 04 | अर्जुन उवाच । |
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| 05 | गुरूनहत्वा हि महानुभावान् |
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| 06 | न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो |
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| 07 | कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः |
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| 08 | न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात् |
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| 09 | सञ्जय उवाच । |
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| 10 | तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । |
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| 11 | श्रीभगवानुवाच । |
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| 12 | न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । |
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| 13 | देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । |
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| 14 | मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । |
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| 15 | यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । |
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| 16 | नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । |
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| 17 | अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । |
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| 18 | अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । |
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| 19 | य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । |
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| 20 | न जायते म्रियते वा कदाचि- |
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| 21 | वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । |
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| 22 | वासांसि जीर्णानि यथा विहाय |
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| 23 | नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । |
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| 24 | अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । |
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| 25 | अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । |
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| 26 | अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । |
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| 27 | जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । |
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| 28 | अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । |
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| 29 | आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेन- |
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| 30 | देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । |
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| 31 | स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । |
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| 32 | यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । |
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| 33 | अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि । |
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| 34 | अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । |
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| 35 | भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । |
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| 36 | अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः । |
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| 37 | हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । |
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| 38 | सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । |
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| 39 | एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । |
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| 40 | नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । |
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| 41 | व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । |
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| 42 | यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
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| 43 | भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । |
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| 44 | त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । |
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| 45 | यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । |
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| 46 | कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । |
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| 47 | योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । |
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| 48 | दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय । |
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| 49 | बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । |
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| 50 | कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । |
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| 51 | यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । |
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| 52 | श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । |
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| 53 | अर्जुन उवाच । |
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| 54 | श्रीभगवानुवाच । |
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| 55 | दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । |
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| 56 | यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत् तत् प्राप्य शुभाशुभम् । |
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| 57 | यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । |
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| 58 | विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । |
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| 59 | यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । |
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| 60 | तानि सर्वाणि सम्यम्य युक्त आसीत मत्परः । |
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| 61 | ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । |
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| 62 | क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः । |
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| 63 | रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । [विमुक्तै] |
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| 64 | प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । |
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| 65 | नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । |
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| 66 | इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । |
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| 67 | तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । |
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| 68 | या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति सम्यमी । |
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| 69 | आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं |
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| 70 | विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः । |
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| 71 | एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । |
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इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ 2 |